शनिवार, 5 अप्रैल 2025

मेरी तलाश !

 मैं बड़ी शिद्दत से,

खुद को खुद में तलाश करता हूं !

ढूंढता हूं वो बचपन,

जो कहीं खो गया है मुझमें !

वो लड़कपन, अल्हड़पन,

जो छीन लिया गया !

वो ख्वाब, वो ख्वाहिशें,

वो सब ढूंढना चाहता हूं,

जो अधूरा रह गया !

शायद बड़ी जिम्मेदारियों में,

खो जाया करते हैं,

छोटे छोटे एहसास !

मगर, कभी कभी,

बेवक्त, बेजरूरत,

मिल भी जाया करती हैं,

वो कुछ जरूरी चीजें,

जिनके मिलने की कोई उम्मीद नहीं होती !

शायद यही इत्तेफाक हो जाए,

किसी खुशनुमा दिन की

एक खूबसूरत सुबह !

©दीपक तोमर शामली

प्रकाशित - अमर उजाला काव्य

 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें