मैं बड़ी शिद्दत से,
खुद को खुद में तलाश करता हूं !
ढूंढता हूं वो बचपन,
जो कहीं खो गया है मुझमें !
वो लड़कपन, अल्हड़पन,
जो छीन लिया गया !
वो ख्वाब, वो ख्वाहिशें,
वो सब ढूंढना चाहता हूं,
जो अधूरा रह गया !
शायद बड़ी जिम्मेदारियों में,
खो जाया करते हैं,
छोटे छोटे एहसास !
मगर, कभी कभी,
बेवक्त, बेजरूरत,
मिल भी जाया करती हैं,
वो कुछ जरूरी चीजें,
जिनके मिलने की कोई उम्मीद नहीं होती !
शायद यही इत्तेफाक हो जाए,
किसी खुशनुमा दिन की
एक खूबसूरत सुबह !
©दीपक तोमर शामली
प्रकाशित - अमर उजाला काव्य
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