हे भारत जन के कर्णधार, ये धर्म तुझे बतलाता है !
अविरल निश्छल पथ पर बढ़ना कर्तव्य तुझे सिखलाता है !
जीवन में बाधाएं आएं, तो रुक कर हाथ बढ़ा देना,
अभिमान अगर आए तुझको, तो आंखों से समझा देना !
जो खड़ा हुआ जीवन रण में, बस शौर्य और साहस के बल,
उसको करने को युद्ध विरत करते हो क्यों तुम कुटिल छल !
तुम विजयी हो भी जाओगे तो कायर ही कहलाओगे,
जब प्रजा नहीं होगी तो फिर किसको अभिमान दिखाओगे !
कहकर दुर्योधन तुम्हें यहां इतिहास भुला देगा लिख लो,
ये पथ निश्चित ही अनुचित है, ये समय बता देगा लिख लो !
©दीपक तोमर शामली
प्रकाशित - अमर उजाला काव्य
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