शनिवार, 5 अप्रैल 2025

ये मेरी तन्हाई !

ये मेरी तन्हाई !

कितना कुछ कहती है !

मेरी हर पीड़ा सहती है !

मेरे मन से बातें करती है !

समझती है गहराई तक,

मन के हर भाव को,

हर दुख, हर उदासी को !

उठाती है बोझ मरणासन्न सपनों का !

सुनाती है वो हर किस्सा,

जो कहीं शोर में गुम गया !

बैठता हूं मैं अकेला जब कभी,

अपनी तलाश करने को,

तब आती है साथ निभाने !

और बुनती है वो अफसाने,

जो बन ना सके नगमे !

तन्हाई, मेरी अद्भुत साथी !

जब भी टूटता है कहीं

कुछ मेरे भीतर,

रुला देती हैं वर्जनाएं,

साथ छोड़ जाती है मुस्कुराहट,

तब लौट आती है मेरे पास,

मुझे सहारा देने,

हर उस उदास शाम को,

जिसे मैं चाहता हूं भुला देना,

कहीं सुनसान में अकेले रो लेना,

मन को हल्का कर लेना,

तब कहीं से चुपचाप आकर

बैठ जाती है मेरे साथ !

ये तन्हाई मेरा सबसे अद्भुत साथी है !

©दीपक तोमर शामली

प्रकाशित - अमर उजाला काव्य 

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