शुक्रवार, 4 अप्रैल 2025

भाव सृजन

काव्य सृजन आसान है किन्तु,

बहुत कठिन है भाव सृजन !

एक दर्पण हो अंतर्मन में,

और उस दर्पण में अंतर्मन !

जैसे सूर्य तिमिर को छलता,

छलते हैं कलुषित अंधियारे !

मन के भीतर छिपे हुए हैं,

कई अनछुए मन बंजारे !

कई क्षितिज हैं अभी अछूते,

उन तक जाना संभव भी है !

कई हलाहल पीने बाकी,

और पी पाना संभव भी है !

एक लालसा छिपी हुई सी,

लोकप्रियता पा लेने की !

एक लालसा और है किंतु,

वृक्ष मूल को ढहा देने की !

कट जाने से मूल किन्तु वट,

क्या विचलित हो ही जाएगा ?

तरुवर तो कट जाने पर भी,

तरुवर ही तो कहलायेगा !

सूखेंगे शाखें और पत्ते,

धरा किंतु निर्लिप्त रहेगी !

विचलित बहुत विहग होंगे,

व्यर्थ छांह का कर अर्पण !

काव्य सृजन आसान है किन्तु,

बहुत कठिन है भाव सृजन !

©दीपक तोमर शामली

प्रकाशित - अमर उजाला काव्य

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