काव्य सृजन आसान है किन्तु,
बहुत कठिन है भाव सृजन !
एक दर्पण हो अंतर्मन में,
और उस दर्पण में अंतर्मन !
जैसे सूर्य तिमिर को छलता,
छलते हैं कलुषित अंधियारे !
मन के भीतर छिपे हुए हैं,
कई अनछुए मन बंजारे !
कई क्षितिज हैं अभी अछूते,
उन तक जाना संभव भी है !
कई हलाहल पीने बाकी,
और पी पाना संभव भी है !
एक लालसा छिपी हुई सी,
लोकप्रियता पा लेने की !
एक लालसा और है किंतु,
वृक्ष मूल को ढहा देने की !
कट जाने से मूल किन्तु वट,
क्या विचलित हो ही जाएगा ?
तरुवर तो कट जाने पर भी,
तरुवर ही तो कहलायेगा !
सूखेंगे शाखें और पत्ते,
धरा किंतु निर्लिप्त रहेगी !
विचलित बहुत विहग होंगे,
व्यर्थ छांह का कर अर्पण !
काव्य सृजन आसान है किन्तु,
बहुत कठिन है भाव सृजन !
©दीपक तोमर शामली
प्रकाशित - अमर उजाला काव्य
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