विकलता को हराना चाहता हूं !
मैं अब घर लौट जाना चाहता हूं।
दिशाएं कांपती हैं पाप से अब !
धरा विह्वल हुई संताप से अब !
विखंडित अंग कोमल तरुणियों के,
सहन होते नहीं मां बाप से अब !
हरण होते हैं दामन बेटियों के,
जले हैं अंतः स्थल बेटियों के !
बचाती आबरू को फिर रही हैं,
कलुषता की धरा पर गिर रही है !
बचे हैं अब कहां मानव धरा पर,
हैं फैले हर तरफ दानव धरा पर !
बचाओ कृष्ण अब दुशासनों से,
उतरते चीर इस पावन धरा पर !
करो उद्धार पीड़ित नारियों का,
करो संहार व्यभिचारियों का !
धरा हो लाल इनके रक्त से जब,
मैं तब उत्सव मनाना चाहता हूं !
मैं अब घर लौट जाना चाहता हूं !
©दीपक तोमर शामली
प्रकाशित - अमर उजाला काव्य
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