शुक्रवार, 4 अप्रैल 2025

गृह प्रस्थान

 विकलता को हराना चाहता हूं !

मैं अब घर लौट जाना चाहता हूं।


दिशाएं कांपती हैं पाप से अब !

धरा विह्वल हुई संताप से अब !

विखंडित अंग कोमल तरुणियों के,

सहन होते नहीं मां बाप से अब !

हरण होते हैं दामन बेटियों के,

जले हैं अंतः स्थल बेटियों के !

बचाती आबरू को फिर रही हैं,

कलुषता की धरा पर गिर रही है !

बचे हैं अब कहां मानव धरा पर,

हैं फैले हर तरफ दानव धरा पर !

बचाओ कृष्ण अब दुशासनों से,

उतरते चीर इस पावन धरा पर !

करो उद्धार पीड़ित नारियों का,

करो संहार व्यभिचारियों का !

धरा हो लाल इनके रक्त से जब,

मैं तब उत्सव मनाना चाहता हूं !


मैं अब घर लौट जाना चाहता हूं !

©दीपक तोमर शामली

प्रकाशित - अमर उजाला काव्य

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