प्रथम नमन उसको करते हैं, जो है जग का दाता।
नमन उसे द्वितीय हमें जो ज्ञानमार्ग दिखलाता।
दिया ज्ञान गुरुवर ने, ऐसे सांचे में है ढाला,
आदर्शों की कठिन राह पर करते चलें उजाला।
गुरुओं ने ही तो बतलाया भेद सत्य के बल का,
वर्जित बतलाया प्रयोग असत्य, कपट और छल का।
गुरुओं के पदचिन्हों पर चलकर गंतव्य मिला है,
मिला हमें अम्बर सारा किंतु क्या उन्हें मिला है ?
कठिन तपस्या वर्षों की उनकी बेकार हुई है।
जिनको सब कुछ बाँट दिया, उनसे ही हार हुई है।
जनमानस में उनका कद कमजोर बना डाला है,
ईश्वर सदृश गुरुओं को ही चोर बना डाला है।
नित्य नए आरोप लगा षडयंत्र रचाए जाते,
बलिवेदी पर गुरुओं के नित शीश चढ़ाए जाते।
अत्याचारों के विरोध पर अंकुश घोर लगा है,
शिक्षा पर बल अल्प नहीं, गुरुओं पर जोर लगा है।
शिक्षक का कर्तव्य निभाना हुआ बड़ा ही दुष्कर,
अन्य कार्य करने तुरंत तो गुरु पढ़ाए क्योंकर ?
शिक्षा के देवालय में घनघोर अंधेरा छाया,
अतिज्ञानी जन रच रखते हैं दूषित कलुषित माया।
शिक्षा सदन बेचकर ही त्योहार मनाएंगे ये।
निज हाथों से शिक्षा का व्यापार चलाएंगे ये।
किंतु अनागत की चिंता क्यों होगी भूखे जन को ?
वर्तमान में ही जी लेंगे छोटा करके मन को।
क्षुधा शांत करने को जब सब कुछ बेदाम मिलेगा,
लेंगे श्रद्धा अभित्रासक, शिक्षक बदनाम मिलेगा।
©दीपक तोमर शामली
प्रकाशित - अमर उजाला काव्य
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