रविवार, 20 अप्रैल 2025

नश्तर सी बीनाई !

ज़ख्म देता है दवाई क्यों नहीं देता है फिर ?

रंज देकर रहनुमाई क्यों नहीं देता है फिर ?

हारने पर सबको ताने लाख दे देता है जो,

जीत जाने की बधाई क्यों नहीं देता है फिर ?

इतना दानिशमंद है सबको दिया है कुछ न कुछ,

मेरे हिस्से की कमाई क्यों नहीं देता है फिर ?

करता फिरता है ज़माने में जो मुझको यूं जलील,

मेरे मुंह पर वो बुराई क्यों नहीं देता है फिर ?

वैसे दिख जाती है रंगत सुर्ख ज़ख्मों की उसे,

शोर चीखों का सुनाई क्यों नहीं देता है फिर ?

आपने ऐलान करके कह दिया जिंदा हैं आप,

आप ही का दिल गवाही क्यों नहीं देता है फिर ?

हमसे रखवाता है वो हर एक कतरे का हिसाब,

नश्तरों जैसी बीनाई क्यों नहीं देता है फिर ?

©दीपक तोमर शामली

प्रकाशित - अमर उजाला काव्य 

बुधवार, 16 अप्रैल 2025

तरुवर की वेदना !

एक वृक्ष था सुघड़ और सघन, नदघट के एक कानन में ! 

सहस्र विहग आश्रय पाते थे जिसके नीचे सावन में !

महाकाय प्रतिछाया में कितने पादप उग आए थे,

किंतु अन्य सभी पादप बस उस तरुवर के छाए थे !

उस तरुवर की एक डाल पर कुछ कौवे फिर बैठ गए,

और फिर सारे आश्रित पक्षी उस तरुवर पर ऐंठ गए !

जिस शाखा पर बैठे कौवे, उसके फिर दुर्दिन आए,

प्लावित मेघ शुष्क गुजरे और प्रत्यागत फिर ना आए !

मौसम बदला, नई कोंपले फूट गईं, आया वसंत !

किंतु उस तरुवर का वेदन तिल तिल बढ़ता गया अनंत !

सूख गया वो वृक्ष अचानक, ये अचरज की बात हुई !

एक शाख के कुटिल घात से वृक्षप्राण को मात हुई !

कौवे तो कौवे हैं, वो फिर और ढूंढ लेंगे तरुवर,

अन्य विहग कैसे कर पाएंगे विस्मृत मरुधर का डर !

अन्य वृक्ष क्या कभी काग़ का आश्रयस्थल बन पाएंगे ?

या फिर काग सदैव वृक्ष के प्रतिघाती कहलाएंगे ?

©दीपक तोमर

९ मार्च २०२५


शनिवार, 5 अप्रैल 2025

गुरुओं की व्यथा !

 प्रथम नमन उसको करते हैं, जो है जग का दाता।

नमन उसे द्वितीय हमें जो ज्ञानमार्ग दिखलाता।


दिया ज्ञान गुरुवर ने, ऐसे सांचे में है ढाला,

आदर्शों की कठिन राह पर करते चलें उजाला।


गुरुओं ने ही तो बतलाया भेद सत्य के बल का,

वर्जित बतलाया प्रयोग असत्य, कपट और छल का।


गुरुओं के पदचिन्हों पर चलकर गंतव्य मिला है,

मिला हमें अम्बर सारा किंतु क्या उन्हें मिला है ?


कठिन तपस्या वर्षों की उनकी बेकार हुई है।

जिनको सब कुछ बाँट दिया, उनसे ही हार हुई है।


जनमानस में उनका कद कमजोर बना डाला है,

ईश्वर सदृश गुरुओं को ही चोर बना डाला है।


नित्य नए आरोप लगा षडयंत्र रचाए जाते,

बलिवेदी पर गुरुओं के नित शीश चढ़ाए जाते।


अत्याचारों के विरोध पर अंकुश घोर लगा है,

शिक्षा पर बल अल्प नहीं, गुरुओं पर जोर लगा है।


शिक्षक का कर्तव्य निभाना हुआ बड़ा ही दुष्कर,

अन्य कार्य करने तुरंत तो गुरु पढ़ाए क्योंकर ?


शिक्षा के देवालय में घनघोर अंधेरा छाया,

अतिज्ञानी जन रच रखते हैं दूषित कलुषित माया।


शिक्षा सदन बेचकर ही त्योहार मनाएंगे ये।

निज हाथों से शिक्षा का व्यापार चलाएंगे ये।


किंतु अनागत की चिंता क्यों होगी भूखे जन को ?

वर्तमान में ही जी लेंगे छोटा करके मन को।


क्षुधा शांत करने को जब सब कुछ बेदाम मिलेगा,

लेंगे श्रद्धा अभित्रासक, शिक्षक बदनाम मिलेगा।

©दीपक तोमर शामली

प्रकाशित - अमर उजाला काव्य 

मैंने ईश्वर देखा है !

 मैंने ईश्वर को देखा है !

साक्षात ! समक्ष !

निस्संदेह ईश्वर !

किसी देवालय में नहीं,

मात्र कल्पना में नहीं !

आयु के हर सोपान में,

देखी है ईश्वर की प्रतिकृति !

बाल्यकाल में देखा जब,

ईश्वर सौंदर्य का प्रतिरूप था तब !

तरुणाई में देखी असहाय काया,

ईश्वर की जीर्ण, कृशकाय प्रतिछाया !

किंतु अपनी वृद्धावस्था में,

जब मुझे होगी सर्वाधिक चाह

उस ईश्वर के सानिध्य की,

तब देख ना पाऊँगा उसे !

तब वो होगा अपनी यात्रा पर,

शून्य में चिरंतन की यात्रा !

ईश्वर, जो लेता है जब शब्दरूप,

तब बनता है जननी !

मां ! समक्ष जिसकी काया के,

अर्थहीन हो जाते हैं

शब्द और भाषाएं !

मौन हो जाती है हर पीड़ा,

मां, प्रेम, वात्सल्य और स्नेह

को अर्थ देने वाली काया !

निष्काम, निष्कपट, निश्छल,

जो सिखाती है सर्वस्व समर्पण,

किंतु जो नहीं जानती व्यापार,

क्योंकि जिसे नहीं चाहिए,

किंचित मात्र भी प्रतिस्नेह !

मैंने सच ही देखा है ईश्वर,

मां में, मां के वात्सल्य में !

©दीपक तोमर शामली

प्रकाशित - अमर उजाला काव्य 

हुकूमत !

हुकूमत,

तेरी तकरीर को फरमान समझूं,

या ये समझूं कि हर वो बात,

जो लिखते हैं तेरे शाह ए दफ्तर,

चलाते हैं जो हमपे कुंद खंजर,

जो चाहते हैं कि मैं चीखूं,

मगर आवाज ना पहुंचे कहीं

चौखट पे तेरी !

लहू रोके हुए हूं मैं कहीं आंखों में अपनी,

किसी दिन जब कहीं हम,

बिना रहबर के होंगे रूबरू तो,

दिखा दूंगा तुझे कि,

सितम झेले हैं कितने मैने तेरे !

तुझे हैरत तो होगी जानकर ये,

कि जिंदा हूं अभी तक,

ये बतलाने को तुझको,

कि मिट सकता नहीं मैं इस तरह तो !

भले ही लाख कोशिश कर ले लेकिन,

नहीं रहती सदा ये हुक्मरानी,

यही दस्तूर है, होता यही आया है अब तक,

कि मिटता है निजाम ए जुल्म एक दिन,

भले ही लाख कर ले जुल्म लेकिन,

लहू बेकस का लाता है कयामत !

©दीपक तोमर शामली 

प्रकाशित - अमर उजाला काव्य 

जीवन के सबक

 पिता के कंधों पर बैठ कर,


दुनिया देखना ऐसा था,

जैसे ये पूरी कायनात,

मिल्कियत हो हमारी !

उनकी उंगली थाम कर चलना,

जैसे जीवन के लक्ष्य की ओर,

निर्बाध प्रस्थान हो !

और जैसे मैं बढ़ता गया,

उनके शब्दों की मिठास घटी,

जो उनकी शिक्षा थी,

मुझे तैयार करने को,

झेलने के लिए सच्चाई,

इस कड़वे समाज की !

शायद समझाना चाहते थे,

मूक रहकर, अपने मौन से,

कि वो हमेशा नहीं रहेंगे,

अपने शरीर में, मगर,

रहेंगे हमेशा मेरे साथ,

उस हर सबक के मूल में,

जो उन्होंने दिए थे,

अपने जाने से पहले !

©दीपक तोमर शामली 

प्रकाशित - अमर उजाला काव्य 

ग्राम्य जीवन !

इतना सुंदर चित्रण तुमको ग्राम्य हृदय का कहां मिलेगा।

दिनकर के स्वागत को तत्पर,

धवल चांदनी के क्षिप्त पर,

देवालय के मधुर गान पर,

शंखध्वनियों के अभ्यांतर,

धूल धूसरित ओढ़े अंचल,

धर कांधे काष्ठक कराल हल,

नग्न पांव मिट्टी से साने,

बढ़ते जाते धीरे धीरे,

खेतों में हरियाली बोते,

स्वर्ण अन्न की बाली बोते,

फैली है चहुंओर हरितिमा,

मृदु अवनि की भाव भंगिमा,

लथपथ स्वेद कणों से हलधर,

लेते कुछ पल का अभ्यंतर

ग्रामवधू लातीं बकुचा भर,

करके तृप्त उदर की ज्वाला,

भूमिपुत्र जुट जाते श्रम पर।

दूर क्षितिज पर फैल लालिमा,

सूर्य गमन की भेज सूचना,

आमंत्रित करती है निशा को,

तब हल लाद पुष्ट कांधों पर,

चले हांकते पुष्ट वृषभ को,

लौट निकेतन आ जाते हैं।

यह दृष्टांत आत्मतृप्ति का और धरा पर कहां मिलेगा !

©दीपक तोमर शामली 

प्रकाशित - अमर उजाला काव्य

ये मेरी तन्हाई !

ये मेरी तन्हाई !

कितना कुछ कहती है !

मेरी हर पीड़ा सहती है !

मेरे मन से बातें करती है !

समझती है गहराई तक,

मन के हर भाव को,

हर दुख, हर उदासी को !

उठाती है बोझ मरणासन्न सपनों का !

सुनाती है वो हर किस्सा,

जो कहीं शोर में गुम गया !

बैठता हूं मैं अकेला जब कभी,

अपनी तलाश करने को,

तब आती है साथ निभाने !

और बुनती है वो अफसाने,

जो बन ना सके नगमे !

तन्हाई, मेरी अद्भुत साथी !

जब भी टूटता है कहीं

कुछ मेरे भीतर,

रुला देती हैं वर्जनाएं,

साथ छोड़ जाती है मुस्कुराहट,

तब लौट आती है मेरे पास,

मुझे सहारा देने,

हर उस उदास शाम को,

जिसे मैं चाहता हूं भुला देना,

कहीं सुनसान में अकेले रो लेना,

मन को हल्का कर लेना,

तब कहीं से चुपचाप आकर

बैठ जाती है मेरे साथ !

ये तन्हाई मेरा सबसे अद्भुत साथी है !

©दीपक तोमर शामली

प्रकाशित - अमर उजाला काव्य 

मेरी तलाश !

 मैं बड़ी शिद्दत से,

खुद को खुद में तलाश करता हूं !

ढूंढता हूं वो बचपन,

जो कहीं खो गया है मुझमें !

वो लड़कपन, अल्हड़पन,

जो छीन लिया गया !

वो ख्वाब, वो ख्वाहिशें,

वो सब ढूंढना चाहता हूं,

जो अधूरा रह गया !

शायद बड़ी जिम्मेदारियों में,

खो जाया करते हैं,

छोटे छोटे एहसास !

मगर, कभी कभी,

बेवक्त, बेजरूरत,

मिल भी जाया करती हैं,

वो कुछ जरूरी चीजें,

जिनके मिलने की कोई उम्मीद नहीं होती !

शायद यही इत्तेफाक हो जाए,

किसी खुशनुमा दिन की

एक खूबसूरत सुबह !

©दीपक तोमर शामली

प्रकाशित - अमर उजाला काव्य

 

कर्तव्य !

 हे भारत जन के कर्णधार, ये धर्म तुझे बतलाता है !

अविरल निश्छल पथ पर बढ़ना कर्तव्य तुझे सिखलाता है !

जीवन में बाधाएं आएं, तो रुक कर हाथ बढ़ा देना,

अभिमान अगर आए तुझको, तो आंखों से समझा देना !

जो खड़ा हुआ जीवन रण में, बस शौर्य और साहस के बल,

उसको करने को युद्ध विरत करते हो क्यों तुम कुटिल छल !

तुम विजयी हो भी जाओगे तो कायर ही कहलाओगे,

जब प्रजा नहीं होगी तो फिर किसको अभिमान दिखाओगे !

कहकर दुर्योधन तुम्हें यहां इतिहास भुला देगा लिख लो,

ये पथ निश्चित ही अनुचित है, ये समय बता देगा लिख लो !

©दीपक तोमर शामली

प्रकाशित - अमर उजाला काव्य

शुक्रवार, 4 अप्रैल 2025

वो पिता है !

 वो पिता है,

जिसके होने का सिर्फ एहसास,

भर देता है एक नई ऊर्जा से !

जिसकी आंखों में हमेशा दिखता है,

असीम प्रेम, निश्छल वात्सल्य !

पर जिसकी जुबां पर नहीं आता,

एक शब्द तक भी प्रेम का !

एक वृक्ष, जो पहले देता है फल,

फिर छाया, और फिर,

अपनी उम्र के पतझड़ में,

देता है नव निर्माण का काष्ठ !

पिता...

जो खाता है सिर्फ उतना,

जितने में हमें खिलाने के काबिल रहे !

जो बुनता है सपने,

हमारे प्रशस्त, उद्दीप्त जीवन के,

कोमल मन और कठोर हाथों से !

कठोरता नहीं उसमें स्वभावगत,

मगर दिखाता है खुद को,

जैसे अडिग चट्टान हो कोई !

डटा रहता है दिन रात,

समय के थपेड़ों को झेलता हुआ,

जिसका डर रहता है उसके रहने पर,

और चले जाने पर आता है,

एक उदास एकांकीपन !

खालीपन ! जिसे वही भर सकता है,

या फिर उसकी स्मृतियां !

©दीपक तोमर

प्रकाशित - अमर उजाला काव्य

गृह प्रस्थान

 विकलता को हराना चाहता हूं !

मैं अब घर लौट जाना चाहता हूं।


दिशाएं कांपती हैं पाप से अब !

धरा विह्वल हुई संताप से अब !

विखंडित अंग कोमल तरुणियों के,

सहन होते नहीं मां बाप से अब !

हरण होते हैं दामन बेटियों के,

जले हैं अंतः स्थल बेटियों के !

बचाती आबरू को फिर रही हैं,

कलुषता की धरा पर गिर रही है !

बचे हैं अब कहां मानव धरा पर,

हैं फैले हर तरफ दानव धरा पर !

बचाओ कृष्ण अब दुशासनों से,

उतरते चीर इस पावन धरा पर !

करो उद्धार पीड़ित नारियों का,

करो संहार व्यभिचारियों का !

धरा हो लाल इनके रक्त से जब,

मैं तब उत्सव मनाना चाहता हूं !


मैं अब घर लौट जाना चाहता हूं !

©दीपक तोमर शामली

प्रकाशित - अमर उजाला काव्य

भाव सृजन

काव्य सृजन आसान है किन्तु,

बहुत कठिन है भाव सृजन !

एक दर्पण हो अंतर्मन में,

और उस दर्पण में अंतर्मन !

जैसे सूर्य तिमिर को छलता,

छलते हैं कलुषित अंधियारे !

मन के भीतर छिपे हुए हैं,

कई अनछुए मन बंजारे !

कई क्षितिज हैं अभी अछूते,

उन तक जाना संभव भी है !

कई हलाहल पीने बाकी,

और पी पाना संभव भी है !

एक लालसा छिपी हुई सी,

लोकप्रियता पा लेने की !

एक लालसा और है किंतु,

वृक्ष मूल को ढहा देने की !

कट जाने से मूल किन्तु वट,

क्या विचलित हो ही जाएगा ?

तरुवर तो कट जाने पर भी,

तरुवर ही तो कहलायेगा !

सूखेंगे शाखें और पत्ते,

धरा किंतु निर्लिप्त रहेगी !

विचलित बहुत विहग होंगे,

व्यर्थ छांह का कर अर्पण !

काव्य सृजन आसान है किन्तु,

बहुत कठिन है भाव सृजन !

©दीपक तोमर शामली

प्रकाशित - अमर उजाला काव्य

खेतों के बेटे !

हम खेतों के बेटे हैं,

पनप आते हैं मिट्टी में !

जीते हैं कुटिल अंधेरों में !


वो छीन लें बेशक हमारी जमीनें,

हमारे हल, बैल,

फावड़ा, कुदाल, मगर,

हम उग आएंगे फिर से,

खरपतवार की तरह !


सीखते हैं जीना संघर्षों से,

बेचना अपनी फसल को उधार,

और फिर हाथ फैलाते रहना !

सूद पर लेकर बीज,

सूखी मिट्टी में बोना !

धन के भूखे जन को,

अन्न पर पालना !

और फिर हमारे अन्न पर पले,

धनलोलुपों की गालियां सहना !


पर नियति ये नहीं हमारी,

हमारी नियति है उग आना,

स्याह अंधेरों के बीच

फसलों के लिए जीना,

अन्न उगाते उगाते मर जाना !

गलत को गलत कहना,

सच के लिए लड़ जाना !


वो छीन लें हमारे

मुंह के निवाले बेशक !

मगर हम फिर से खड़े होंगे,

क्योंकि लहू नहीं हमारी रगों में,

बह रही है खेतों की मिट्टी,


वो मिट्टी जो

भूख कुचलने को,

उगलती है अनाज,

और अति कुचलने को

उगलती है शौर्य !

हम खेतों के बेटे हैं ! !

©दीपक तोमर शामली

अमर उजाला काव्य में प्रकाशित