ज़ख्म देता है दवाई क्यों नहीं देता है फिर ?
रंज देकर रहनुमाई क्यों नहीं देता है फिर ?
हारने पर सबको ताने लाख दे देता है जो,
जीत जाने की बधाई क्यों नहीं देता है फिर ?
इतना दानिशमंद है सबको दिया है कुछ न कुछ,
मेरे हिस्से की कमाई क्यों नहीं देता है फिर ?
करता फिरता है ज़माने में जो मुझको यूं जलील,
मेरे मुंह पर वो बुराई क्यों नहीं देता है फिर ?
वैसे दिख जाती है रंगत सुर्ख ज़ख्मों की उसे,
शोर चीखों का सुनाई क्यों नहीं देता है फिर ?
आपने ऐलान करके कह दिया जिंदा हैं आप,
आप ही का दिल गवाही क्यों नहीं देता है फिर ?
हमसे रखवाता है वो हर एक कतरे का हिसाब,
नश्तरों जैसी बीनाई क्यों नहीं देता है फिर ?
©दीपक तोमर शामली
प्रकाशित - अमर उजाला काव्य
