हुकूमत,
तेरी तकरीर को फरमान समझूं,
या ये समझूं कि हर वो बात,
जो लिखते हैं तेरे शाह ए दफ्तर,
चलाते हैं जो हमपे कुंद खंजर,
जो चाहते हैं कि मैं चीखूं,
मगर आवाज ना पहुंचे कहीं
चौखट पे तेरी !
लहू रोके हुए हूं मैं कहीं आंखों में अपनी,
किसी दिन जब कहीं हम,
बिना रहबर के होंगे रूबरू तो,
दिखा दूंगा तुझे कि,
सितम झेले हैं कितने मैने तेरे !
तुझे हैरत तो होगी जानकर ये,
कि जिंदा हूं अभी तक,
ये बतलाने को तुझको,
कि मिट सकता नहीं मैं इस तरह तो !
भले ही लाख कोशिश कर ले लेकिन,
नहीं रहती सदा ये हुक्मरानी,
यही दस्तूर है, होता यही आया है अब तक,
कि मिटता है निजाम ए जुल्म एक दिन,
भले ही लाख कर ले जुल्म लेकिन,
लहू बेकस का लाता है कयामत !
©दीपक तोमर शामली
प्रकाशित - अमर उजाला काव्य
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