शनिवार, 5 अप्रैल 2025

हुकूमत !

हुकूमत,

तेरी तकरीर को फरमान समझूं,

या ये समझूं कि हर वो बात,

जो लिखते हैं तेरे शाह ए दफ्तर,

चलाते हैं जो हमपे कुंद खंजर,

जो चाहते हैं कि मैं चीखूं,

मगर आवाज ना पहुंचे कहीं

चौखट पे तेरी !

लहू रोके हुए हूं मैं कहीं आंखों में अपनी,

किसी दिन जब कहीं हम,

बिना रहबर के होंगे रूबरू तो,

दिखा दूंगा तुझे कि,

सितम झेले हैं कितने मैने तेरे !

तुझे हैरत तो होगी जानकर ये,

कि जिंदा हूं अभी तक,

ये बतलाने को तुझको,

कि मिट सकता नहीं मैं इस तरह तो !

भले ही लाख कोशिश कर ले लेकिन,

नहीं रहती सदा ये हुक्मरानी,

यही दस्तूर है, होता यही आया है अब तक,

कि मिटता है निजाम ए जुल्म एक दिन,

भले ही लाख कर ले जुल्म लेकिन,

लहू बेकस का लाता है कयामत !

©दीपक तोमर शामली 

प्रकाशित - अमर उजाला काव्य 

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