मैंने ईश्वर को देखा है !
साक्षात ! समक्ष !
निस्संदेह ईश्वर !
किसी देवालय में नहीं,
मात्र कल्पना में नहीं !
आयु के हर सोपान में,
देखी है ईश्वर की प्रतिकृति !
बाल्यकाल में देखा जब,
ईश्वर सौंदर्य का प्रतिरूप था तब !
तरुणाई में देखी असहाय काया,
ईश्वर की जीर्ण, कृशकाय प्रतिछाया !
किंतु अपनी वृद्धावस्था में,
जब मुझे होगी सर्वाधिक चाह
उस ईश्वर के सानिध्य की,
तब देख ना पाऊँगा उसे !
तब वो होगा अपनी यात्रा पर,
शून्य में चिरंतन की यात्रा !
ईश्वर, जो लेता है जब शब्दरूप,
तब बनता है जननी !
मां ! समक्ष जिसकी काया के,
अर्थहीन हो जाते हैं
शब्द और भाषाएं !
मौन हो जाती है हर पीड़ा,
मां, प्रेम, वात्सल्य और स्नेह
को अर्थ देने वाली काया !
निष्काम, निष्कपट, निश्छल,
जो सिखाती है सर्वस्व समर्पण,
किंतु जो नहीं जानती व्यापार,
क्योंकि जिसे नहीं चाहिए,
किंचित मात्र भी प्रतिस्नेह !
मैंने सच ही देखा है ईश्वर,
मां में, मां के वात्सल्य में !
©दीपक तोमर शामली
प्रकाशित - अमर उजाला काव्य
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें