शनिवार, 5 अप्रैल 2025

मैंने ईश्वर देखा है !

 मैंने ईश्वर को देखा है !

साक्षात ! समक्ष !

निस्संदेह ईश्वर !

किसी देवालय में नहीं,

मात्र कल्पना में नहीं !

आयु के हर सोपान में,

देखी है ईश्वर की प्रतिकृति !

बाल्यकाल में देखा जब,

ईश्वर सौंदर्य का प्रतिरूप था तब !

तरुणाई में देखी असहाय काया,

ईश्वर की जीर्ण, कृशकाय प्रतिछाया !

किंतु अपनी वृद्धावस्था में,

जब मुझे होगी सर्वाधिक चाह

उस ईश्वर के सानिध्य की,

तब देख ना पाऊँगा उसे !

तब वो होगा अपनी यात्रा पर,

शून्य में चिरंतन की यात्रा !

ईश्वर, जो लेता है जब शब्दरूप,

तब बनता है जननी !

मां ! समक्ष जिसकी काया के,

अर्थहीन हो जाते हैं

शब्द और भाषाएं !

मौन हो जाती है हर पीड़ा,

मां, प्रेम, वात्सल्य और स्नेह

को अर्थ देने वाली काया !

निष्काम, निष्कपट, निश्छल,

जो सिखाती है सर्वस्व समर्पण,

किंतु जो नहीं जानती व्यापार,

क्योंकि जिसे नहीं चाहिए,

किंचित मात्र भी प्रतिस्नेह !

मैंने सच ही देखा है ईश्वर,

मां में, मां के वात्सल्य में !

©दीपक तोमर शामली

प्रकाशित - अमर उजाला काव्य 

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