हम खेतों के बेटे हैं,
पनप आते हैं मिट्टी में !
जीते हैं कुटिल अंधेरों में !
वो छीन लें बेशक हमारी जमीनें,
हमारे हल, बैल,
फावड़ा, कुदाल, मगर,
हम उग आएंगे फिर से,
खरपतवार की तरह !
सीखते हैं जीना संघर्षों से,
बेचना अपनी फसल को उधार,
और फिर हाथ फैलाते रहना !
सूद पर लेकर बीज,
सूखी मिट्टी में बोना !
धन के भूखे जन को,
अन्न पर पालना !
और फिर हमारे अन्न पर पले,
धनलोलुपों की गालियां सहना !
पर नियति ये नहीं हमारी,
हमारी नियति है उग आना,
स्याह अंधेरों के बीच
फसलों के लिए जीना,
अन्न उगाते उगाते मर जाना !
गलत को गलत कहना,
सच के लिए लड़ जाना !
वो छीन लें हमारे
मुंह के निवाले बेशक !
मगर हम फिर से खड़े होंगे,
क्योंकि लहू नहीं हमारी रगों में,
बह रही है खेतों की मिट्टी,
वो मिट्टी जो
भूख कुचलने को,
उगलती है अनाज,
और अति कुचलने को
उगलती है शौर्य !
हम खेतों के बेटे हैं ! !
©दीपक तोमर शामली
अमर उजाला काव्य में प्रकाशित
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