शुक्रवार, 4 अप्रैल 2025

वो पिता है !

 वो पिता है,

जिसके होने का सिर्फ एहसास,

भर देता है एक नई ऊर्जा से !

जिसकी आंखों में हमेशा दिखता है,

असीम प्रेम, निश्छल वात्सल्य !

पर जिसकी जुबां पर नहीं आता,

एक शब्द तक भी प्रेम का !

एक वृक्ष, जो पहले देता है फल,

फिर छाया, और फिर,

अपनी उम्र के पतझड़ में,

देता है नव निर्माण का काष्ठ !

पिता...

जो खाता है सिर्फ उतना,

जितने में हमें खिलाने के काबिल रहे !

जो बुनता है सपने,

हमारे प्रशस्त, उद्दीप्त जीवन के,

कोमल मन और कठोर हाथों से !

कठोरता नहीं उसमें स्वभावगत,

मगर दिखाता है खुद को,

जैसे अडिग चट्टान हो कोई !

डटा रहता है दिन रात,

समय के थपेड़ों को झेलता हुआ,

जिसका डर रहता है उसके रहने पर,

और चले जाने पर आता है,

एक उदास एकांकीपन !

खालीपन ! जिसे वही भर सकता है,

या फिर उसकी स्मृतियां !

©दीपक तोमर

प्रकाशित - अमर उजाला काव्य

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें