वो पिता है,
जिसके होने का सिर्फ एहसास,
भर देता है एक नई ऊर्जा से !
जिसकी आंखों में हमेशा दिखता है,
असीम प्रेम, निश्छल वात्सल्य !
पर जिसकी जुबां पर नहीं आता,
एक शब्द तक भी प्रेम का !
एक वृक्ष, जो पहले देता है फल,
फिर छाया, और फिर,
अपनी उम्र के पतझड़ में,
देता है नव निर्माण का काष्ठ !
पिता...
जो खाता है सिर्फ उतना,
जितने में हमें खिलाने के काबिल रहे !
जो बुनता है सपने,
हमारे प्रशस्त, उद्दीप्त जीवन के,
कोमल मन और कठोर हाथों से !
कठोरता नहीं उसमें स्वभावगत,
मगर दिखाता है खुद को,
जैसे अडिग चट्टान हो कोई !
डटा रहता है दिन रात,
समय के थपेड़ों को झेलता हुआ,
जिसका डर रहता है उसके रहने पर,
और चले जाने पर आता है,
एक उदास एकांकीपन !
खालीपन ! जिसे वही भर सकता है,
या फिर उसकी स्मृतियां !
©दीपक तोमर
प्रकाशित - अमर उजाला काव्य
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