रविवार, 20 अप्रैल 2025

नश्तर सी बीनाई !

ज़ख्म देता है दवाई क्यों नहीं देता है फिर ?

रंज देकर रहनुमाई क्यों नहीं देता है फिर ?

हारने पर सबको ताने लाख दे देता है जो,

जीत जाने की बधाई क्यों नहीं देता है फिर ?

इतना दानिशमंद है सबको दिया है कुछ न कुछ,

मेरे हिस्से की कमाई क्यों नहीं देता है फिर ?

करता फिरता है ज़माने में जो मुझको यूं जलील,

मेरे मुंह पर वो बुराई क्यों नहीं देता है फिर ?

वैसे दिख जाती है रंगत सुर्ख ज़ख्मों की उसे,

शोर चीखों का सुनाई क्यों नहीं देता है फिर ?

आपने ऐलान करके कह दिया जिंदा हैं आप,

आप ही का दिल गवाही क्यों नहीं देता है फिर ?

हमसे रखवाता है वो हर एक कतरे का हिसाब,

नश्तरों जैसी बीनाई क्यों नहीं देता है फिर ?

©दीपक तोमर शामली

प्रकाशित - अमर उजाला काव्य 

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