इतना सुंदर चित्रण तुमको ग्राम्य हृदय का कहां मिलेगा।
दिनकर के स्वागत को तत्पर,
धवल चांदनी के क्षिप्त पर,
देवालय के मधुर गान पर,
शंखध्वनियों के अभ्यांतर,
धूल धूसरित ओढ़े अंचल,
धर कांधे काष्ठक कराल हल,
नग्न पांव मिट्टी से साने,
बढ़ते जाते धीरे धीरे,
खेतों में हरियाली बोते,
स्वर्ण अन्न की बाली बोते,
फैली है चहुंओर हरितिमा,
मृदु अवनि की भाव भंगिमा,
लथपथ स्वेद कणों से हलधर,
लेते कुछ पल का अभ्यंतर
ग्रामवधू लातीं बकुचा भर,
करके तृप्त उदर की ज्वाला,
भूमिपुत्र जुट जाते श्रम पर।
दूर क्षितिज पर फैल लालिमा,
सूर्य गमन की भेज सूचना,
आमंत्रित करती है निशा को,
तब हल लाद पुष्ट कांधों पर,
चले हांकते पुष्ट वृषभ को,
लौट निकेतन आ जाते हैं।
यह दृष्टांत आत्मतृप्ति का और धरा पर कहां मिलेगा !
©दीपक तोमर शामली
प्रकाशित - अमर उजाला काव्य
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें