एक वृक्ष था सुघड़ और सघन, नदघट के एक कानन में !
सहस्र विहग आश्रय पाते थे जिसके नीचे सावन में !
महाकाय प्रतिछाया में कितने पादप उग आए थे,
किंतु अन्य सभी पादप बस उस तरुवर के छाए थे !
उस तरुवर की एक डाल पर कुछ कौवे फिर बैठ गए,
और फिर सारे आश्रित पक्षी उस तरुवर पर ऐंठ गए !
जिस शाखा पर बैठे कौवे, उसके फिर दुर्दिन आए,
प्लावित मेघ शुष्क गुजरे और प्रत्यागत फिर ना आए !
मौसम बदला, नई कोंपले फूट गईं, आया वसंत !
किंतु उस तरुवर का वेदन तिल तिल बढ़ता गया अनंत !
सूख गया वो वृक्ष अचानक, ये अचरज की बात हुई !
एक शाख के कुटिल घात से वृक्षप्राण को मात हुई !
कौवे तो कौवे हैं, वो फिर और ढूंढ लेंगे तरुवर,
अन्य विहग कैसे कर पाएंगे विस्मृत मरुधर का डर !
अन्य वृक्ष क्या कभी काग़ का आश्रयस्थल बन पाएंगे ?
या फिर काग सदैव वृक्ष के प्रतिघाती कहलाएंगे ?
©दीपक तोमर
९ मार्च २०२५

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