बुधवार, 16 अप्रैल 2025

तरुवर की वेदना !

एक वृक्ष था सुघड़ और सघन, नदघट के एक कानन में ! 

सहस्र विहग आश्रय पाते थे जिसके नीचे सावन में !

महाकाय प्रतिछाया में कितने पादप उग आए थे,

किंतु अन्य सभी पादप बस उस तरुवर के छाए थे !

उस तरुवर की एक डाल पर कुछ कौवे फिर बैठ गए,

और फिर सारे आश्रित पक्षी उस तरुवर पर ऐंठ गए !

जिस शाखा पर बैठे कौवे, उसके फिर दुर्दिन आए,

प्लावित मेघ शुष्क गुजरे और प्रत्यागत फिर ना आए !

मौसम बदला, नई कोंपले फूट गईं, आया वसंत !

किंतु उस तरुवर का वेदन तिल तिल बढ़ता गया अनंत !

सूख गया वो वृक्ष अचानक, ये अचरज की बात हुई !

एक शाख के कुटिल घात से वृक्षप्राण को मात हुई !

कौवे तो कौवे हैं, वो फिर और ढूंढ लेंगे तरुवर,

अन्य विहग कैसे कर पाएंगे विस्मृत मरुधर का डर !

अन्य वृक्ष क्या कभी काग़ का आश्रयस्थल बन पाएंगे ?

या फिर काग सदैव वृक्ष के प्रतिघाती कहलाएंगे ?

©दीपक तोमर

९ मार्च २०२५


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